भारत में लगने वाला ऐसा मेला जहॉं चुन सकते हैं अपनी पसंद की लड़की और कर सकते हैं प्रेम विवाह
भगोरिया मेले की शुरुआत का सटीक ऐतिहासिक वर्ष स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है, लेकिन माना जाता है कि इसकी परंपरा 500 से 700 साल पुरानी है। यह मुख्य रूप से मालवा और निमाड़ क्षेत्र में रहने वाले भील और भिलाला जनजातियों द्वारा मनाया जाता है ।
इतिहास और उत्पत्ति
ऐसा माना जाता है कि यह मेला भील राजा भगीरथ द्वारा शुरू किया गया था, जिन्होंने इसे फसल कटाई के उत्सव के रूप में मनाना शुरू किया था।
कुछ ऐतिहासिक मतों के अनुसार, इसकी परंपरा मुगलकाल से पहले की है, जब भील राजा और उनके वंशज इसे मनाते थे।
यह उत्सव पहले केवल पारंपरिक मेलों के रूप में होता था, लेकिन समय के साथ यह प्रेम विवाह की परंपरा से भी जुड़ गया।
भगोरिया मेला मध्य प्रदेश के मालवा और निमाड़ क्षेत्र (मुख्यतः झाबुआ, धार, बड़वानी, अलीराजपुर) में मनाया जाने वाला एक प्रसिद्ध पारंपरिक मेला है। यह होली से पहले आयोजित किया जाता है और भील तथा भावसिंह जनजातियों का महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता है।
भगोरिया मेले की खासियतें
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प्रेम और विवाह का मेला:
- इस मेले को प्रेम और विवाह से जोड़कर देखा जाता है। यहां युवक-युवतियां पारंपरिक परिधानों में सजकर आते हैं और अपनी पसंद के जीवनसाथी को चुनते हैं।
- अगर किसी युवक-युवती की पसंद एक-दूसरे से मेल खा जाती है, तो वे भागकर शादी कर लेते हैं, जिसे समाज की स्वीकृति प्राप्त होती है।
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सांस्कृतिक रंग:
- मेले में लोक नृत्य, संगीत, वाद्य यंत्र (मांदल, ढोल) और पारंपरिक गीतों की धूम रहती है।
- पारंपरिक वेशभूषा और गहनों में सजे लोग मेले में विशेष आकर्षण का केंद्र होते हैं।
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व्यापार और हाट बाजार:
- मेले में खेती से जुड़े उपकरण, आभूषण, खिलौने और घरेलू सामानों की बिक्री होती है।
- खाद्य पदार्थों में महुआ से बनी शराब और अन्य पारंपरिक व्यंजन भी उपलब्ध रहते हैं।
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भगोरिया नाम की उत्पत्ति:
- ‘भगोरिया’ शब्द ‘भगना’ से निकला है, जो प्रेमी युगलों के भागकर शादी करने की परंपरा को दर्शाता है।
- कुछ विद्वान मानते हैं कि यह उत्सव राजा भगीरथ के समय से प्रचलित है, जिससे इसका नाम "भगोरिया" पड़ा।
कब और कहां आयोजित होता है?
- यह मेला होली से एक सप्ताह पहले शुरू होता है और विभिन्न गाँवों एवं कस्बों में अलग-अलग दिनों में आयोजित किया जाता है।
- प्रमुख स्थानों में झाबुआ, अलीराजपुर, बड़वानी, धार, खरगोन आदि शामिल हैं।
भगोरिया मेला केवल एक मेला नहीं बल्कि जनजातीय संस्कृति, प्रेम और सामाजिक मेलजोल का उत्सव है। यह आदिवासी समुदायों की स्वतंत्रता और परंपराओं को दर्शाने वाला अनूठा आयोजन है।
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